क्या कहूं ,तुझे ऐ ताजमहल

प्यार में बनी एक याद,

या कटे हाथो की फ़रियाद

क्या कहूँ.......तुझे ए ताजमहल ........


 


जिसने बख्शी तुझे खूबसूरती,

जिसने दिए तुझे २२ साल ,

इनाम में कटे हाथ वो,

आज पूछते तुझसे सवाल ......

की क्या कसूर हमारा था ,

हमने तो रूप तेरा सवारा था

मरे को याद करते है लोग,

जिन्दा लोगो की औकात नहीं ...

प्यार की बातें ....करते है लोग

पर दिल में शायद जज्बात नहीं,

जो मन में था

कहने की करी पहल

पर क्या कहें ......तुझे ए ताजमहल.............

शिव.