सर में सौदा भी नहीं, दिल में तमन्ना भी नहीं
लेकिन इस तर्क-ए-मोहब्बत का भरोसा भी नहीं
दिल की गिनती न यगानों में, न बेगानों में
लेकिन उस जलवा-गाह-ए-नाज़ से उठता भी नहीं
मेहेरबानी को मोहब्बत नहीं कहते ए दोस्त
आह अब मुझसे तेरी रंजिश बेजा भी नहीं
आह ये मजमा-ए-अहबाब, ये बज्म-ए-खामोश
आज महफिल में फिराक सुखन-आरा भी नहीं
(फिराक गोरखपुरी)